संवैधानिक मूल्यों पर एक नज़र

एस जी हक़

आज 26 जनवरी है और आज ही के दिन वर्ष 1950 में देश में संविधान लागू किया गया था। भारत का संविधान बहुत से लोगों के लिए महज़ एक क़ानून की किताब बन कर रह गई है, लेकिन यह किताब वास्तव में देश की दशा और दिशा तय करती है। यह वह किताब है जो देश के करोड़ों लोगों को जीने का हौसला देती है तथा बेहतर ज़िन्दगी जीने की तमन्ना लिए समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए आशा की एक किरण है।

हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन के नायकों ने एक सपना देखा था। वह सपना यह था कि अंग्रेज़ों की गुलामी से निजात पा कर  ग़रीबी, भय, हर तरह के भेद-भाव एवं दमन मुक्त भारत का निर्माण कर के मानवीय गरिमा के साथ ज़िन्दगी बसर करेंगे, जहाँ बोलने की आज़ादी होगी, समता तथा सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय होगा। देश के हर नागरिक को फलने-फूलने के लिए सामान अवसर मिलेंगे। भारत का संविधान इसी सपने को साकार करने के लिए बनाया गया था। यह संविधान 2 साल, 11 महीने और 18 दिन की अथक मेहनत  के बाद बन कर तैयार हुआ था।

संविधान ने नागरिकों को सम्मान पूर्वक ज़िन्दगी जीने के लिए निश्चित आदर्श तय किये हैं। ये वह आदर्श हैं जो भारत के लोगों की इच्छा के अनुसार देश शासित करने का आधार तय करती हैं।  भारतीय संविधान के जो आदर्श मूल्य हैं उसकी झलक संविधान की प्रस्तावना में ही निहित है। उल्लेखनीय है कि, संविधान की प्रस्तावना को ‘संविधान की कुंजी या आत्मा’ कहा जाता है। संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं” से बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि, भारत एक लोकतंत्र वाला प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी तथा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। इस प्रस्तावना में “हम भारत के लोग…” यह बताता है कि, यहाँ सर्वोच्च प्रभुत्ता भारत के लोगों की ही है और यह प्रभुत्व सम्पन्न देश समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और  लोकतंत्रात्मक मूल्यों के द्वारा शासित होगा। ज़ाहिर है हमारे देश में विभिन्न धर्म, समुदाय एवं संप्रदाय के लोग रहते हैं, जिनकी धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं के साथ-साथ ज़रूरतें भी अलग-अलग होती हैं। इसलिए संविधान सभी नागरिकों को किसी भी भेद-भाव के बिना क़ानून की नज़र में बराबर मान कर अपने-अपने धर्म, भाषा एवं संस्कृति को अपनाने का अधिकार देते हुए गरिमा पूर्ण जीवन बसर करने का मार्ग प्रशस्त करता है तथा उन्हें समानता का अधिकार (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से अनुच्छेद 22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से अनुच्छेद 24), धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 28), शिक्षा और संस्कृति का अधिकार (अनुच्छेद 29 से अनुच्छेद 30) तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32) जैसे मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इन मौलिक अधिकारों से किसी भी नागरिक को वंचित नहीं किया जा सकता है और अधिकारों के हनन होने की स्थिति में उसके उपचार का अधिकार भी मौलिक अधिकार ही है।

देश के अधिकतर लोग तो संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों की बातें करते अक्सर दिखाई देते हैं, किन्तु इसी संविधान में लिखित मौलिक कर्तव्यों पर कहीं चर्चा नहीं होती है। लोग सिर्फ़ अपने अधिकारों की बातें करते हैं, लेकिन उन्हें बहैसियत नागरिक किन कर्तव्यों का पालन करना है पता नहीं होता। इसकी एक वजह यह भी है कि, आज संवैधानिक मूल्यों से अधिकांश लोग परिचित तक नहीं हैं।

दरअसल मौलिक कर्तव्यों को वर्ष 1976 में सरकार ने 42वें संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा था। इसके पीछे बुनियादी मक़सद देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने के साथ-साथ देश की एकता-अखंडता को बनाए रखने के लिए सभी नागरिकों के नैतिक दायित्वों को परिभाषित किया गया है। मूल रूप से मौलिक कर्तव्यों की संख्या दस है, किन्तु वर्ष 2002 में 86वें संशोधन द्वारा इसे ग्यारह कर दिया गया है। यह संविधान के चतुर्थ भाग में वर्णित है, किन्तु मौलिक अधिकारों के विपरीत इसे कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।

यह मौलिक कर्तव्य इस प्रकार हैं: प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे, स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों का सम्मान करे, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाए रखे, देश की रक्षा करे, भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भाईचारे की भावना का निर्माण करे, हमारी संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परीक्षण करे, प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धण करे, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान अर्जित करने की भावना का विकास करे, सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे, व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे तथा माता-पिता या अभिभावक द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना।

गौर तलब है कि, इन मौलिक कर्तव्यों का उल्लंघन या अनुपालन न होने पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती है, किन्तु, संविधान ने नागरिकों को इन कर्तव्यों का पालन करने के लिए नैतिक रूप से बाध्य किया है।

दरअसल कर्तव्य शब्द का मतलब ही यही होता है कि, लोग उसे अंजाम देने के लिए नैतिक रूप से ही वचनबद्ध होते हैं। यह एक नैतिक ज़िम्मेदारी होती है, जिसे एक व्यक्ति को निभाना होता है। यह भी एक हक़ीक़त है कि, अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अगर हम बतौर नागरिक हक़ पाने के अधिकारी हैं तो देश के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियां भी है। एक बात हमेशा याद रखने की है कि, कर्तव्य और अधिकार सदैव सहगामी होते हैं।

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